तुम बहुत सताते हो
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पहली मोहब्बत का,
पहला इजहार किया।
पलकों में बिठाया मुझे,
बहुत प्यार किया।
मेरी खामोशी में भी तुम,
मेरी चाह समझ जाते हो।
क्यों अब समझ नहीं पाते हो,
तुम बहुत सताते हो।
जाओ अब मैं भी न तुमसे बोलूं,
मुंह फेर खामोश ही हो लूं।
फिर न कहना सुनो न जान,
मुस्कुरा दो एक बार बात मेरी लो मान।
अब न हाथ थामे चलूंगी एक कदम,
जाओ बाहों में सर न रखूंगी हमदम।
मोबाइल में ही हाथ फेरते
जुल्फें अब न सहलाते हो,
तुम बहुत सताते हो।
आंखों में मेरे घंटों खोना तुम्हें भाता था,
मेरी बातों में खनक नजर आता था।
बड़े ध्यान से मुझे सुना करते थे,
हर लम्हा मेरे साथ गुजारा करते थे।
मेरा नखरा सारा अब तुम उठाते नहीं,
रूठ बैठी हूं तुमसे पर तुम मनाते नहीं।
समय का अभाव है जान बस यही जताते हो,
तुम बहुत सताते हो।😏
– श्रीमती अंजना दिलीप दास
बसना, छत्तीसगढ़
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