हंसता जमाना मुझपे,
मारे है ताना।
कह के चिढ़ाए,
तेरा कहां गया कान्हा।।
आश लगाए अंखियां,
खोजे चहुं ओर।
बैठा है तू छुप के,
कहां चित्त चोर।।
कहां गया तेरा,
दौड़ द्रोपदी को जाना।
कहां गया तेरा गज,
ग्राह से बचाना।।
भूल गया क्या तू,
हाथ प्रेम बिक जाना।
हंसता जमाना मुझपे,
मारे है ताना।।
ग़र नहीं आओगे,
लाज तेरी जाएगी।
मेरी नहीं भक्त की,
शाख मिट जाएगी।।
हाथ पकड़ है तुझे,
लोगों को बताना।
नहीं है अकेला,
जो है तेरे दीवाना।।
अब और नहीं प्रभु,
भक्त को रुलाना।
हंसता जमाना मुझपे,
मारे है ताना।।
अर्जुन सा अज्ञान,
आ मुझको है घेरा।
केआर्म पथ में मोह ने,
आ डाला डेरा।।
साथ सारथि सा निभाना,
क्या तूने छोड़ा।
क्यों प्रभु मुझसे,
तूने मुख अपना मोड़ा।।
कहते हैं लोग,
मेरी कश्ती डूब जाना।
हंसता जमाना मुझपे,
मारे है ताना।।
स्वरचित _मौलिक_अर्चना आनंद गाजीपुर उत्तर प्रदेश