Tuesday, December 9, 2025

प्रभु पुकार

हंसता जमाना मुझपे,
मारे है ताना।
कह के चिढ़ाए,
तेरा कहां गया कान्हा।।

आश लगाए अंखियां,
खोजे चहुं ओर।
बैठा है तू छुप के,
कहां चित्त चोर।।
कहां गया तेरा,
दौड़ द्रोपदी को जाना।
कहां गया तेरा गज,
ग्राह से बचाना।।
भूल गया क्या तू,  
हाथ प्रेम बिक जाना।
हंसता जमाना मुझपे,
मारे है ताना।।

ग़र नहीं आओगे,
लाज तेरी जाएगी।
मेरी नहीं भक्त की,
शाख मिट जाएगी।।
हाथ पकड़ है तुझे,
लोगों को बताना।
नहीं है अकेला,
जो है तेरे दीवाना।।
अब और नहीं प्रभु,
भक्त को रुलाना।
हंसता जमाना मुझपे,
मारे है ताना।।

अर्जुन सा अज्ञान,
आ मुझको है घेरा।
केआर्म पथ में मोह ने,
आ डाला डेरा।।
साथ सारथि सा निभाना,
क्या तूने छोड़ा।
क्यों प्रभु मुझसे,
तूने मुख अपना मोड़ा।।
कहते हैं लोग,
मेरी कश्ती डूब जाना।
हंसता जमाना मुझपे,
मारे है ताना।।


स्वरचित _मौलिक_अर्चना आनंद गाजीपुर उत्तर प्रदेश

Monday, December 8, 2025

मुक्तक

प्रेमी की नज़र में मैं वफ़ा-दार नहीं हूँ
माँ से दग़ा करने को मैं तैयार नहीं हूँ
पगड़ी पिता की रौंद के मैं इश्क़ निभाऊँ
कैसे करूँ ये जुर्म, मैं गद्दार नहीं हूँ
— त्रिशिका धरा


प्रेयसी का प्रिय के प्रति गुस्सा


तुम बहुत सताते हो 
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पहली मोहब्बत का,
पहला इजहार किया।
पलकों में बिठाया मुझे, 
बहुत प्यार किया।
मेरी खामोशी में भी तुम,
मेरी चाह समझ जाते हो।
क्यों अब समझ नहीं पाते हो,
तुम बहुत सताते हो।

जाओ अब मैं भी न तुमसे बोलूं,
मुंह फेर खामोश ही हो लूं।
फिर न कहना सुनो न जान,
मुस्कुरा दो एक बार बात मेरी लो मान।
अब न हाथ थामे चलूंगी एक कदम,
जाओ बाहों में सर न रखूंगी हमदम।
मोबाइल में ही हाथ फेरते 
जुल्फें अब न सहलाते हो,
तुम बहुत सताते हो।

आंखों में मेरे घंटों खोना तुम्हें भाता था,
मेरी बातों में खनक नजर आता था।
बड़े ध्यान से मुझे सुना करते थे,
हर लम्हा मेरे साथ गुजारा करते थे।
मेरा नखरा सारा अब तुम उठाते नहीं,
रूठ बैठी हूं तुमसे पर तुम मनाते नहीं।
समय का अभाव है जान बस यही जताते हो,
तुम बहुत सताते हो।😏

– श्रीमती अंजना दिलीप दास 
बसना, छत्तीसगढ़

प्रेम गीत


नवयौवना सजी है सोलह श्रृंगार से,
प्रियतम के मन हरने को ।
लाज है अधरों पर शोभित,
व्याकुल मन है प्रिय के आलिंगन में बिखरने को।

बिंदिया आज चमक रही माथे पे,
कुमकुम भी हैं आज अलमस्त।
झुमके गुनगुना रहे प्रेम गीत,
हृदय वेग तीव्र होगा देखें जो आज हमरस्त।

अजब मनमोहक सा आकर्षण है,
तीखे तीखे नैनो में बसे अंजन की लकीरों में ।
रेशमी काली जुल्फों के प्रेमपाश ही,
बांध लेंगे प्रियतम को प्रीत की जंजीरों में।

– अंजना दिलीप दास

प्रभु पुकार

हंसता जमाना मुझपे, मारे है ताना। कह के चिढ़ाए, तेरा कहां गया कान्हा।। आश लगाए अंखियां, खोजे चहुं ओर। बैठा है तू छुप के, कहां चित...